देविओं के धरती पर आज भी नारी अबला क्यों ?

आखिर कब तक ऐसे चलेगा ? कब कोई स्री बिना किसी खौफ के बहार निकल सकेगी। इन दरिंदो का कोई जमीर नहीं है , कोई भगवान नहीं है , न ये देवी मानते हैं न देवता। क्यों एक पीड़िता घुट-घुट कर जीने पर विवश कर दी जाती है ? क्यों उन हत्यारों को फांसी के फंदों पर लटकने के लिए सात से अधिक वर्ष लग गए। कैसे इस समाज का उधार होगा, किस मूह से ये भारत अपनी संस्कृतियों का महिमा-मंडन करेगा जब यहाँ एक स्री देविओं की तरह हर घर में पूजी जाती है और सड़क पर उसे नोचने के लिए गिद्ध बैठे हुए हैं।

कब तक एक लड़की, एक औरत को अपने बाप  की या अपने पति की संपत्ति मात्र समझा जायेगा?सम्भतः कहीं-कहीं औरतों की इज्जत होती होगी, और वही घर समृद्धियों से भरा होगा वहीँ लक्ष्मी निवास करती होंगी लेकिन सिर्फ एक दो घर से नहीं होगा, हमें और हमारे पुरे समाज को बदलाव की आव्यशकता है।उम्मीद करता हूँ सब सुधरेगा , सब ठीक हो जयेगा, आखिर उमीद पर ही दुनिया कायम है। सुरक्षित रहें, सतर्क रहें और अपना ध्यान रखें।

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